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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
हस्तप्राप्तमहं मन्ये साम्प्रतं सव्यसाचिनम् |  ६   क
निर्जित्य दुर्धरं द्रोणं सपदानुगमाहवे ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति