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सभा पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
रक्षणाद्धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् |  १   क
शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति