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वन पर्व
अध्याय १६२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्वूनदपरिष्कृतम् |  ४   क
मेघनादिनमारुह्य श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति