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सभा पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते |  १८   क
धनं च वहु वार्ष्णेय़ त्वत्प्रसादादुपार्जितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति