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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |  ४३   क
रत्नान्यादाय़ भूरीणि प्रय़यौ पुष्करेक्षणः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति