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सभा पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चक्रुरनुज्ञाताः शरणान्युत शिल्पिनः |  ३८   क
रत्नवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति