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सभा पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन्प्रति परस्परम् |  ४   क
राजवल्लभतश्चैव नाश्रूय़न्त मृषा गिरः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति