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सभा पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ४४   क
जगाम यज्ञाय़तनं वृतो विप्रैः सहस्रशः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति