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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
उद्विग्नस्य कुतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् |  १२   क
न जातु वशगो भर्ता स्त्रिय़ाः स्यान्मन्त्रकारणात् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति