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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः; सुसंशितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् |  ५   क
रौद्रं शरं संय़ति सुप्रधौतं; पार्थार्थमत्यर्थचिराय़ गुप्तम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति