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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
स त्वं धर्मभृतां श्रेष्ठं राजानं धर्मसंहितम् |  ५   क
प्रसादय़ कुरुश्रेष्ठमेतदत्र मतं मम ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति