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विराट पर्व
अध्याय ३६
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अर्जुन उवाच
भय़ेन दीनरूपोऽसि द्विषतां हर्षवर्धनः |  १७   क
न च तावत्कृतं किञ्चित्परैः कर्म रणाजिरे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति