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विराट पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ |  २९   क
सम्प्रय़ातं महाराज निनीषन्तं गवां पदम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति