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विराट पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो जवेन महता गोपाः पुरमथाव्रजत् |  ४   क
अपश्यन्मत्स्यराजं च रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति