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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रव्रज्याय़ां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः |  ७   क
विनाशमुखमेतत्ते केनाख्यातं दुरात्मना ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति