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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
एवं मां भरतश्रेष्ठो गाङ्गेय़ः प्राह शास्त्रवित् |  १४   क
तत्र सर्वात्मना मन्ये भीष्मस्यैवाभिपालनम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति