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द्रोण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
समासाद्य तु पाण्डूनामनीकानि सहस्रशः |  १६   क
द्रोणेन चरता सङ्ख्ये प्रभग्नानि शितैः शरैः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति