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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
संस्पृशानः शरांस्तीक्ष्णांस्तूणादाशीविषोपमान् |  १८   क
मय़ैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्वकेणान्धको यथा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति