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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नन्तरे जिष्णुर्हत्वा संशप्तकान्वली |  ४१   क
अव्ययात्तत्र यत्र स्म द्रोणः पाण्डून्प्रमर्दति ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति