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द्रोण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ंश्च ते सर्वे पाण्डवानां महारथाः |  २८   क
कथं नो वासविस्त्राय़ाच्छत्रुभ्य इति मारिष ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति