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द्रोण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
तथापि तव पुत्रस्य प्रिय़कामा विशां पते |  ३   क
यशः प्रवीरा लोकेषु रक्षन्तो द्रोणमन्वय़ुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति