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द्रोण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
यं यं स्म भजते द्रोणः पाञ्चालानां रथव्रजम् |  ८   क
तत्र तत्र स्म पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नोऽथ धीय़ते ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति