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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
महाझषस्येव मुखं प्रपन्नाः; प्रभद्रकाः कर्णमभि द्रवन्ति |  १०   क
मृत्योरास्यं व्यात्तमिवान्वपद्य; न्प्रभद्रकाः कर्णमासाद्य राजन् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति