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वन पर्व
अध्याय १२२
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लोमश उवाच
तथा स संवृतो धीमान्मृत्पिण्ड इव सर्वशः |  ४   क
तप्यति स्म तपो राजन्वल्मीकेन समावृतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति