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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
नाहं भीषय़ितुं शक्यो वाङ्मात्रेण कथञ्चन |  ४   क
अन्यं जानीहि यः शक्यस्त्वय़ा भीषय़ितुं रणे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति