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द्रोण पर्व
अध्याय ४५
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धृतराष्ट्र उवाच
यथा वदसि मे सूत एकस्य वहुभिः सह |  १   क
सङ्ग्रामं तुमुलं घोरं जय़ं चैव महात्मनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति