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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
मय़ा हिमवतः शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम् |  ५०   क
दृष्टाश्च वहवो देशा नानाधर्मसमाकुलाः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति