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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
स च दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः |  १८   क
यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन्व्यवस्थितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति