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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
सर्वे त्वां शूर इत्येव जना जल्पन्ति संसदि |  १९   क
व्यर्थं तद्भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशाय़िनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति