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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
आसाद्य च कुरुश्रेष्ठ तदा द्वैपाय़नह्रदम् |  २   क
स्तम्भितं धार्तराष्ट्रेण दृष्ट्वा तं सलिलाशय़म् |  २   ख
वासुदेवमिदं वाक्यमव्रवीत्कुरुनन्दनः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति