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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
न हि शूराः पलाय़न्ते शत्रून्दृष्ट्वा कथञ्चन |  २६   क
व्रूहि वा त्वं यय़ा धृत्या शूर त्यजसि सङ्गरम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति