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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अरुन्धतीं ततो दृष्ट्वा तीव्रं निय़ममास्थिताम् |  ३२   क
अथागमत्त्रिनय़नः सुप्रीतो वरदस्तदा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति