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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
दैवीं माय़ामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम् |  ४   क
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन्विमोक्ष्यते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति