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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनस्तूवरक मूढ औदरिकेति च |  ३   क
अकृतास्त्रक मा योधीर्वाल सङ्ग्रामकातर ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति