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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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दुर्योधन उवाच
वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी |  ४९   क
न हि मे निर्जितस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति