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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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युधिष्ठिर उवाच
अधर्मेण न गृह्णीय़ां त्वय़ा दत्तां महीमिमाम् |  ५३   क
न हि धर्मः स्मृतो राजन्क्षत्रिय़स्य प्रतिग्रहः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति