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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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युधिष्ठिर उवाच
अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि |  ५५   क
त्वय़ेय़ं पृथिवी राजन्किं न दत्ता तदैव हि ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति