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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण; माकाशमास्थाय़ विमूढसञ्ज्ञाः |  २०   क
कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते; भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति