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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
हृदय़ं सर्वभूतानां पर्वणोऽङ्गुष्ठमात्रकः |  १५   क
अनुग्रसत्यनन्तं हि महात्मा विश्वमीश्वरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति