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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
यथा संहरते जन्तून्ससर्ज च पुनः पुनः |  २   क
अनादिनिधनो व्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति