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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
जगद्दग्ध्वामितवलः केवलं जगतीं ततः |  ७   क
अम्भसा वलिना क्षिप्रमापूर्यत समन्ततः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति