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शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
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याज्ञवल्क्य उवाच
प्रकृतिर्गुणान्विकुरुते स्वच्छन्देनात्मकाम्यया |  १५   क
क्रीडार्थं तु महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति