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शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
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याज्ञवल्क्य उवाच
यथा दीपसहस्राणि दीपान्मर्त्याः प्रकुर्वते |  १६   क
प्रकृतिस्तथा विकुरुते पुरुषस्य गुणान्वहून् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति