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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप |  ११   क
स एष प्रकृतिष्ठो हि तस्थुरित्यभिधीय़ते ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति