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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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याज्ञवल्क्य उवाच
अचेतनश्चैष मतः प्रकृतिस्थश्च पार्थिव |  १२   क
एतेनाधिष्ठितश्चैव सृजते संहरत्यपि ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति