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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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याज्ञवल्क्य उवाच
द्वन्द्वमेषां त्रय़ाणां तु संनिपातं च तत्त्वतः |  ५   क
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति