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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
मन्यन्ते यतय़ः शुद्धा अध्यात्मविगतज्वराः |  ११   क
अनित्यं नित्यमव्यक्तमेवमेतद्धि शुश्रुम ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति