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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
ये त्वन्यथैव पश्यन्ति न सम्यक्तेषु दर्शनम् |  १९   क
ते व्यक्तं निरय़ं घोरं प्रविशन्ति पुनः पुनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति