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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
ये त्वन्ये तत्त्वकुशलास्तेषामेतन्निदर्शनम् |  २१   क
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगानामपि दर्शनम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति