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शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
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याज्ञवल्क्य उवाच
गुणस्वभावस्त्वव्यक्तो गुणानेवाभिवर्तते |  ३   क
उपय़ुङ्क्ते च तानेव स चैवाज्ञः स्वभावतः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति